
20 साल के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार प्री-2006 सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को वह न्याय मिला, जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी। कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद सरकार ने इन पेंशनर्स को ₹25,000 करोड़ का बकाया एरियर देने का ऐलान किया है। यह मामला 2008 में शुरू हुआ था जब एक सरकारी आदेश ने प्री और पोस्ट-2006 Pensioners के बीच असमानता पैदा कर दी थी, जिससे लाखों रिटायर्ड कर्मचारियों को कम पेंशन मिलने लगी।
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2008 का सरकारी आदेश बना असमानता की जड़
पेंशन असमानता का यह मामला उस समय सामने आया जब 6वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करते समय सरकार ने प्री-2006 सेवानिवृत्त कर्मचारियों को संशोधित पेंशन देने से मना कर दिया। इससे उनकी पेंशन पोस्ट-2006 से रिटायर हुए कर्मचारियों की तुलना में काफी कम हो गई। पेंशनर्स संगठनों ने इस अन्याय को चुनौती दी और मामले को दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचाया।
दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला बना उम्मीद
20 मार्च 2024 को दिल्ली हाई कोर्ट ने FORIPSO (Forum of Retired IPS Officers) के पक्ष में फैसला सुनाया और सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि सभी पात्र पेंशनर्स को तीन महीने के भीतर संशोधित पेंशन के साथ बकाया एरियर का भुगतान किया जाए। इस आदेश के बाद उम्मीद जगी कि वर्षों से लटकी पेंशन असमानता की समस्या अब खत्म हो जाएगी।
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₹25,000 करोड़ का वित्तीय असर और सरकार की रणनीति
इस फैसले के बाद सरकार पर ₹25,000 करोड़ का भारी वित्तीय भार आया है। हर प्रभावित पेंशनर को औसतन ₹14.5 लाख से ₹16.5 लाख तक का एरियर मिलेगा। यह राशि केंद्र सरकार के पेंशन बजट पर बड़ा असर डालेगी, लेकिन इसे कर्मचारी हित में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। सरकार अब इस रकम के भुगतान के लिए अलग बजटीय प्रावधान कर रही है।
वित्त अधिनियम 2025 ने पैदा की नई बहस
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के समानांतर, सरकार ने वित्त अधिनियम 2025 के जरिए पेंशन नियमों में संशोधन किया है जिसमें रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर पेंशनर्स को वर्गीकृत करने की व्यवस्था की गई है। यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के खिलाफ माना जा रहा है और इससे भविष्य में फिर से कानूनी लड़ाई की आशंका बनी हुई है।
लाखों पेंशनर्स की उम्मीदें जुड़ीं इस फैसले से
इस फैसले से पूरे देश के लाखों प्री-2006 पेंशनर्स को एक नई आशा मिली है। कई बुजुर्ग कर्मचारियों ने अपने जीवन के आखिरी वर्षों में न्याय पाने की उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन अब यह फैसला उनके लिए संजीवनी बनकर आया है। यह न केवल आर्थिक राहत है, बल्कि उनके सम्मान की भी पुनर्स्थापना है।
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