
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) की नई भर्ती नीति पर दिल्ली हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से EPFO Recruitment 2025 में Young Professionals की भर्ती प्रक्रिया में अपनाए गए मूल्यांकन मानकों को लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि NIRF top 40 law colleges से स्नातक आवेदकों को 100 में से 15 से 30 अतिरिक्त अंक दिए गए, जो बाकी उम्मीदवारों के साथ भेदभावपूर्ण है।
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रैंकिंग पर आधारित अंक व्यवस्था पर उठे सवाल
इस विवाद का मूल कारण EPFO द्वारा अपनाई गई वो नीति है, जिसमें National Institutional Ranking Framework यानी NIRF Ranking में शीर्ष 40 में आने वाले लॉ कॉलेजों के छात्रों को अतिरिक्त वेटेज दिया गया। यह नीति भले ही योग्यता आधारित चयन के पक्ष में दिखाई दे, लेकिन याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और अवसर की गारंटी का उल्लंघन करती है।
दिल्ली हाईकोर्ट की सख्ती
इस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला शामिल हैं, ने केंद्र सरकार से इस नीति पर स्पष्ट जवाब मांगा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह परखना चाहता है कि क्या यह अंक देने की नीति वस्तुतः भेदभाव नहीं करती। अगली सुनवाई की तारीख 23 अप्रैल निर्धारित की गई है।
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केंद्र सरकार की स्थिति और संभावित प्रभाव
केंद्र सरकार को अब इस बात का जवाब देना है कि EPFO जैसे सरकारी संगठन की भर्ती नीति में NIRF रैंकिंग का यह विशेषाधिकार किस आधार पर तय किया गया। यदि कोर्ट इस नीति को असंवैधानिक मानता है, तो भविष्य की Government Job Recruitment Policies पर भी इसका असर पड़ सकता है। यह मामला न केवल EPFO भर्ती बल्कि पूरे सरकारी सिस्टम में Merit-Based Selection बनाम Equal Opportunity के बीच संतुलन की बहस को जन्म देता है।
भविष्य की भर्तियों पर असर और युवाओं की चिंता
देशभर के युवा, जो EPFO जैसे प्रतिष्ठित संगठनों में करियर बनाना चाहते हैं, इस निर्णय को लेकर चिंतित हैं। यदि यह नीति वैध ठहराई जाती है, तो अन्य सरकारी नौकरियों में भी NIRF या इसी तरह की रैंकिंग आधारित अंक प्रणाली लागू की जा सकती है। यह उन छात्रों के लिए असमान परिस्थिति पैदा कर सकती है, जो प्रतिष्ठित कॉलेजों में पढ़ाई नहीं कर सके लेकिन योग्यता रखते हैं।
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