
पुराना या नया टैक्स Regime—यह सवाल आज हर टैक्सपेयर के मन में है, खासकर जब फाइनेंशियल ईयर खत्म होने वाला हो या जब इनकम टैक्स रिटर्न-ITR भरने का समय नजदीक आ रहा हो। यह चुनाव सिर्फ रेट्स का नहीं है, बल्कि टैक्स बचत, डिडक्शन और लॉन्ग टर्म प्लानिंग से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला है। सही चुनाव जहां आपको हजारों की बचत दिला सकता है, वहीं गलती आपको न सिर्फ आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है बल्कि टैक्स फाइलिंग में दिक्कत भी पैदा कर सकती है।
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सैलरीड टैक्सपेयर्स को हर साल मिलती है नई छूट
अगर आपकी आय वेतन या पेंशन जैसे नॉन-बिजनेस सोर्स से आती है, तो आपको हर फाइनेंशियल ईयर में पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Regime) और नई टैक्स व्यवस्था (New Regime) के बीच बदलने की छूट है। यानी आप साल दर साल अपनी इनकम, निवेश और डिडक्शन को देखकर तय कर सकते हैं कि कौन सी Regime आपके लिए बेहतर है। लेकिन याद रखें, यह चुनाव रिटर्न फाइल करने की अंतिम तारीख से पहले ही करना होता है, वरना आप नई Regime में ही अटके रह जाएंगे।
व्यापारियों और पेशेवरों के लिए हैं सख्त नियम
अगर आपकी कमाई बिजनेस या प्रोफेशनल इनकम से आती है तो टैक्स Regime का चुनाव आपके लिए एक बार का खेल है। आप एक बार Old से New Regime में स्विच कर सकते हैं, लेकिन अगर आप वापस Old Regime में लौट आए, तो दोबारा New Regime को अपनाने की अनुमति नहीं दी जाती। यही वजह है कि व्यापारियों और फ्रीलांसरों को टैक्स Regime का चुनाव करते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि एक बार लिया गया फैसला सालों तक असर डाल सकता है।
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टैक्स Regime बदलने के लिए जरूरी प्रक्रिया
Old Regime को चुनने के लिए आपको इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने से पहले फॉर्म 10-IEA भरना होता है। यह फॉर्म सरकार को बताता है कि आपने कौन-सी टैक्स व्यवस्था चुनी है। लेकिन अगर आप नियत तारीख के बाद रिटर्न फाइल कर रहे हैं, तो फॉर्म 10-IEA नहीं भर सकते और आपको मजबूरन New Tax Regime को अपनाना पड़ेगा। ऐसे में आप चाहकर भी अपनी टैक्स प्लानिंग के मुताबिक रेजीम नहीं चुन पाएंगे।
टैक्स प्लानिंग और बचत पर असर डालता है Regime का चुनाव
Old Tax Regime जहां आपको धारा 80C, 80D, HRA और Home Loan Interest जैसी छूटें देता है, वहीं New Tax Regime में टैक्स स्लैब कम हैं लेकिन लगभग सभी डिडक्शन खत्म कर दिए गए हैं। ऐसे में जिन लोगों के पास ज्यादा डिडक्शन हैं, उनके लिए Old Regime फायदेमंद हो सकती है, जबकि जिनके पास सीमित डिडक्शन हैं, वे New Regime से कम टैक्स दे सकते हैं। इसलिए हर टैक्सपेयर को अपनी इनकम और डिडक्शन स्ट्रक्चर का विश्लेषण करना चाहिए।
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